पर्यावरण संरक्षण बना उपलब्धि, पर लोकतांत्रिक मर्यादा पर उठे सवाल—आमजन में गहरी चर्चा
सोशल मीडिया पर भी दिखी गर्माहट, लोगों ने कमेंट कर जताया विरोध
श्योपुर दिनांक 1 मार्च 2026
श्योपुर जिले में पर्यावरण और पर्यटन की दृष्टि से एक ऐतिहासिक कदम उस समय देखने को मिला, जब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कूनो नेशनल पार्क क्षेत्र की कूनो नदी में घड़ियाल और कछुओं का रिलीज कार्यक्रम कर विलुप्तप्राय जीवों के संरक्षण का संकल्प लिया। पालपुर फोर्ट के सामने आयोजित इस कार्यक्रम में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सहित श्योपुर से ग्वालियर और भोपाल तक के जनप्रतिनिधि व प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।
कार्यक्रम को पर्यावरण संरक्षण की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल आमजन के बीच चर्चा का विषय बन गया—जिस जिले में कार्यक्रम हुआ, उसी जिले की दोनों विधानसभा सीटों के निर्वाचित विधायक कार्यक्रम में नजर क्यों नहीं आए?
विधायकों की गैरमौजूदगी पर उठे सवाल
स्थानीय लोगों के अनुसार, श्योपुर विधानसभा-1 से विधायक बाबू जड़ेल और श्योपुर विधानसभा-2 से विधायक मुकेश मल्होत्रा की अनुपस्थिति को लेकर आमजन में असमंजस है। लोगों का कहना है कि यह शासकीय कार्यक्रम था या किसी राजनीतिक दल का आयोजन? यदि यह सरकार का कार्यक्रम था, तो जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की मौजूदगी अपेक्षित थी।
‘शासकीय कार्यक्रम या पार्टी कार्यक्रम?’—जनता के बीच बहस
आम चर्चा यह है कि हालिया शासकीय कार्यक्रमों में जनप्रतिनिधियों को दरकिनार किया जा रहा है, जिससे यह संदेश जा रहा है कि कार्यक्रम जनता या प्रशासन के नहीं, बल्कि किसी दल विशेष के हैं। स्थानीय मत के अनुसार, इससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की भावना को ठेस पहुंचती है।
लोग यह भी याद दिला रहे हैं कि श्योपुर की जनता ने बार-बार विधानसभा में कांग्रेस को चुना, यहां तक कि उपचुनाव में भी पार्टी बदलने के बाद उम्मीदवार को जनता ने स्वीकार नहीं किया। “यहां चेहरा नहीं, जनता ने पार्टी चुनी”—ऐसी धारणा लंबे समय से बनी रही है।
कूनो कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों की गैरहाजिरी बनी बहस का मुद्दा
कूनो नेशनल पार्क में आयोजित घड़ियाल–कछुआ रिलीज कार्यक्रम को लेकर उठे सवाल अब सोशल मीडिया तक पहुंच गए हैं। फेसबुक, और व्हाट्सएप ग्रुप्स पर लोगों ने खुलकर कमेंट और पोस्ट के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया।
यूजर्स का कहना है कि जिस जिले में शासकीय कार्यक्रम आयोजित हुआ, उसी जिले के जनता द्वारा चुने गए विधायकों की गैरमौजूदगी समझ से परे है। कई लोगों ने सवाल उठाया कि यह सरकारी कार्यक्रम था या किसी राजनीतिक दल का, क्योंकि मंच और उपस्थिति से जनता में अलग ही संदेश गया।
कमेंट्स में यह भी लिखा गया कि
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“जनता के प्रतिनिधियों को बुलाए बिना कार्यक्रम करना लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है”
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“शासकीय आयोजन को पार्टी कार्यक्रम की तरह पेश किया जा रहा है”
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“श्योपुर की जनता को हल्के में लिया जा रहा है”
सोशल मीडिया पर बढ़ती प्रतिक्रियाओं से साफ है कि मामला सिर्फ मंच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आमजन के बीच राजनीतिक और प्रशासनिक रवैये पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
राजनीतिक छवि और आने वाले संकेत
स्थानीय मत यह भी है कि यदि निर्वाचित विधायकों की उपेक्षा की छवि मजबूत होती गई, तो इसका असर आने वाले समय में राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। लोग इसे जनता के प्रतिनिधियों का नहीं, बल्कि जनता का तिरस्कार मान रहे हैं—यह बात हम नहीं, आम श्योपुरवासी कह रहे हैं, ऐसा स्थानीय चर्चा में सुनाई दे रहा है।
निष्कर्ष:
कूनो में घड़ियाल–कछुआ रिलीज जैसे कार्यक्रमों ने श्योपुर को राष्ट्रीय मानचित्र पर मजबूती से रखा है। लेकिन लोकतंत्र की आत्मा—जनप्रतिनिधियों की सहभागिता—पर उठे सवाल यह संकेत देते हैं कि उपलब्धियों के साथ समावेश और प्रतिनिधित्व भी उतना ही जरूरी है।


