श्योपुर/बड़ौदा 27 नवंबर 2025
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की बड़ौदा यात्रा के दौरान दोनों विधानसभा क्षेत्रों के चुने हुए जनप्रतिनिधियों — श्योपुर विधायक बाबू जंडेल और अन्य कांग्रेस नेताओं को पुलिस द्वारा सभा स्थल तक पहुँचने से रोक दिया गया।
इस कार्रवाई ने जिले की राजनीति ही नहीं, बल्कि आम जनता के मन में भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
विडियो देखें
विधायक को नजरबंद, फिर थाने में ले जाया गया — जनप्रतिनिधि का सम्मान कहाँ गया?
सुबह 11 बजे से ही विधायक बाबू जंडेल को घर से बाहर निकलने नहीं दिया गया।
कुछ देर बाद पुलिस ने उन्हें देहात थाने ले जाकर बैठा दिया।
विधायक का आरोप—
“मैं शांतिपूर्वक किसानों की बात सीएम के सामने रखना चाहता था, पर मुझे जबरन थाने में बैठा दिया गया।”
इस पूरी कार्रवाई ने जनता के बीच यह चर्चा तेज कर दी है कि—
अगर एक निर्वाचित विधायक की आवाज को इस तरह दबाया जा सकता है, तो आम आदमी को कौन सुनेगा?
दोनों विधानसभा क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों को रोकना — भाजपा की हठधर्मिता बताई जा रही
स्थानीय लोग खुलकर कह रहे हैं कि—
-
“जब जनता के चुने हुए विधायक को ही मंच तक पहुँचने नहीं दिया गया…”
-
“जब जनप्रतिनिधि की बात सुनने में भाजपा को डर लग रहा है…”
-
“जब विपक्ष के एक भी नेता को कार्यक्रम में आने नहीं दिया गया…”
…तो ये सब लोकतांत्रिक परंपराओं की कमजोरी और सत्ता की हठधर्मिता को दर्शाता है।
कई ग्रामीणों का कहना है कि भाजपा को इस बात का डर था कि विधायक मंच पर किसानों की बिजली बिल, कर्ज माफी और फसल सर्वे की खामियां उठा सकते थे। इसलिए उन्हें दूर रखा गया।
लोकतंत्र का असली मतलब यह नहीं कि सिर्फ समर्थन करने वालों को ही बोलने दिया जाए
जिले में यह बहस तेज है कि—
“विधायक मंच तक जाते ही सवाल उठाते, इसलिए प्रशासन ने पहले ही रास्ते रोक दिए।”
लेकिन लोग पूछ रहे हैं—
✔ क्या लोकतांत्रिक शासन में जनता के प्रतिनिधियों को रोकना जायज है?
✔ क्या विपक्ष की आवाज खत्म कर देने से सरकार की छवि बेहतर होती है?
✔ अगर विधायक की बात सुनने की हिम्मत नहीं, तो जनता की तकलीफ कौन सुनेगा?
🔥 आम नागरिकों की चर्चा — ‘जब विधायक की नहीं सुनी गई, तो हमारी कौन सुनेगा?’
लोग सोशल मीडिया और गाँवों में खुलकर कह रहे हैं कि—
-
“विधायक तक को पुलिस रोक ले, तो आम नागरिक तो और भी असुरक्षित हो गया।”
-
“अगर सत्ता पक्ष सवालों से इतना डरता है, तो यह लोकतंत्र का कौन-सा मॉडल है?”
-
“हमने जनप्रतिनिधि इसलिए चुने कि वो हमारी आवाज उठाएँ, लेकिन उन्हें ही चुप करा दिया जाता है।”
कई लोगों का यह भी कहना है कि प्रशासन का रवैया बताता है कि—
स्थानीय अधिकारियों और भाजपा नेताओं का गठजोड़ अब किसी भी असहज सवाल को उठने नहीं देना चाहता।
सत्ता बनाम जनता — यह टकराव आगे और बढ़ सकता है
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—
विधायकों को रोकने जैसी घटनाएँ आम जनता में असंतोष बढ़ाती हैं।
किसानों के मुद्दों को लेकर पहले ही नाराजगी है, और अब प्रतिनिधियों को रोकने से स्थिति और बिगड़ सकती है।
निष्कर्ष
भाजपा द्वारा लोगों के चुने हुए विधायकों को सीएम की सभा से दूर रखना सिर्फ राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि जनता की आवाज का अपमान माना जा रहा है।
आम लोगों में यह बात तेजी से फैल रही है कि—
“अगर विधायक की आवाज दबाई जा रही है, तो आम आदमी की क्या बिसात?”
यह मुद्दा आने वाले समय में श्योपुर–बड़ौदा–विकासनगर की राजनीति में बड़ा रोल निभा सकता है।
