तालाब की पार काटकर सड़क निकालने की तैयारी? जल निकासी के नाम पर जमीन का खेल गरम
श्योपुर दिनांक 24/2/26
श्योपुर शहर में इन दिनों एक नई “खिचड़ी” पकने की चर्चा जोरों पर है। सवाल उठ रहा है—डॉक्टर कॉलोनी की जल निकासी के लिए प्रस्तावित नाला निर्माण वास्तव में जनहित की योजना है या फिर तालाब की पार से नई सड़क निकालकर कॉलोनाइजरों को सीधा लाभ पहुंचाने की रणनीति?
मामला केवल 80 लाख रुपये की लागत से प्रस्तावित नाले का नहीं, बल्कि उससे जुड़ी जमीनों के संभावित व्यावसायिक फायदे का भी है। जानकारों का दावा है कि यदि तालाब की पार काटकर 50-60 फीट चौड़ा मार्ग राष्ट्रीय राजमार्ग 552 से जोड़ दिया जाता है, तो आसपास की जमीनों की कीमत 10 लाख से सीधे 40-50 लाख रुपये तक पहुंच सकती है।
अब बड़ा सवाल—नाला सरकार बनाए, सड़क सरकार दे, और मुनाफा किसकी जेब में जाए?
जलभराव की असली पीड़ा
डॉक्टर कॉलोनी वर्षों से बरसात में जलभराव की त्रासदी झेल रही है। कई-कई दिन तक घरों से बाहर निकलना मुश्किल, मच्छरों का प्रकोप, बीमारियों का खतरा—ये सब वहां के रहवासियों की रोजमर्रा की हकीकत रही है।
कॉलोनी बसाने वाला कॉलोनाइजर प्लॉट बेचकर गायब हो गया, और लोग जलभराव की सजा भुगतते रहे। ऐसे में जब जिला प्रशासन ने नाला निर्माण की बात कही तो कॉलोनीवासियों ने कलेक्टर अर्पित वर्मा का स्वागत कर राहत की उम्मीद जताई।
लेकिन शहर में चर्चा इससे आगे बढ़ चुकी है।


तालाब की पार पर ‘रास्ता’ या ‘रिश्ता’?
सूत्रों के अनुसार डॉक्टर कॉलोनी से सटी सरका तालाब की पार के पीछे 40-50 बीघा भूमि पहले से खरीदी जा चुकी है। योजना है—तालाब की पार काटकर सीधा मार्ग निकाला जाए, जिससे नई कॉलोनियां राष्ट्रीय राजमार्ग 552 से जुड़ जाएं।
तालाब की पार काटना केवल राजस्व का विषय नहीं, यह पर्यावरणीय संतुलन का भी सवाल है।
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क्या पर्यावरणीय अनुमति ली गई?
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क्या जल संतुलन पर प्रभाव का अध्ययन हुआ?
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क्या बाढ़ और जलभराव की नई आशंका पर कोई तकनीकी रिपोर्ट है?
या फिर पहले बुलडोजर चलेगा और कागज बाद में आएंगे?
डंडा दिखाने की सख्ती या स्थायी कार्रवाई?
दिसंबर में अवैध कॉलोनियों पर प्रशासन की सख्ती चर्चा में थी। बुलडोजर चले, नोटिस जारी हुए, कॉलोनाइजरों में हड़कंप मचा। लेकिन फरवरी आते-आते सन्नाटा क्यों?
अब शहर में सवाल उठ रहे हैं—
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क्या सख्ती केवल ‘दिसंबर ड्राइव’ थी?
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कितनी कॉलोनियों पर अंतिम कार्रवाई हुई?
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कितने मामलों में एफआईआर दर्ज हुई?
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कितनी जमीन सरकारी खाते में वापस आई?
यदि कार्रवाई निर्णायक है तो आंकड़े सार्वजनिक क्यों नहीं?
सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
राज्य स्तर की समीक्षा बैठक में मुख्य सचिव अनुराग जैन का कथित बयान—“कोई कलेक्टर बिना पैसे के काम नहीं करता”—व्यवस्था पर तीखा व्यंग माना गया। अब यह सवाल श्योपुर के संदर्भ में और गूंज रहा है—क्या सख्ती की धार दबाव की राजनीति में कुंद हो गई?
राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि पहले डर दिखाया जाता है, फिर बातचीत होती है, और अंत

