मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ सख्त नगर पालिका प्रकरण में तीखे सवाल

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श्योपुर नगर पालिका प्रकरण में राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल, मुख्य सचिव को 15 दिन में रिपोर्ट का आदेश

श्योपुर | Crime National News

श्योपुर नगर पालिका परिषद से जुड़े बहुचर्चित प्रकरण में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य शासन और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सिविल रिवीजन क्रमांक 175/2024 (सुमेर सिंह बनाम रेनू गर्ग एवं अन्य) में 19 फरवरी 2026 को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ संकेत दिया कि पूरी जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी नजर नहीं आती।


आयुक्त की कार्यशैली पर कोर्ट की फटकार

सुनवाई के दौरान चंबल संभाग, मुरैना के आयुक्त सुरेश कुमार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने के निर्देश दिए गए। न्यायालय ने पाया कि कोर्ट कार्यवाही का वीडियो लिंक अनधिकृत व्यक्तियों के साथ साझा किया गया। इसे अदालत ने गंभीर कदाचार और न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप की श्रेणी का मामला माना।

व्यक्तिगत उपस्थिति में आयुक्त ने स्वीकार किया कि उन्होंने श्योपुर कलेक्टर को कोई विधिवत नोटिस जारी नहीं किया था। इस पर न्यायालय ने टिप्पणी की कि “सद्भावना” का अर्थ यह नहीं कि बिना तथ्यात्मक सत्यापन के निष्कर्ष निकाल दिए जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी जांच में उचित सावधानी और विधिसम्मत प्रक्रिया अनिवार्य है।


क्लीन चिट पर कोर्ट की कड़ी नाराज़गी

राज्य शासन की ओर से 13 फरवरी 2026 के आदेश का हवाला देते हुए बताया गया कि श्योपुर कलेक्टर (रिटर्निंग ऑफिसर) को दोषमुक्त पाया गया है।

लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पूछा—

  • क्या कलेक्टर से कारण बताओ नोटिस जारी किया गया?

  • क्या उनका विधिवत स्पष्टीकरण लिया गया?

इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर प्रस्तुत नहीं किया जा सका। न्यायालय ने टिप्पणी की कि बिना समुचित जांच “क्लीन चिट” देना गंभीर प्रशासनिक लापरवाही या पक्षपात का संकेत है। अदालत ने जांच रिपोर्ट को प्रथम दृष्टया “दागी” बताते हुए असंतोष व्यक्त किया।


निर्वाचन प्रक्रिया में विरोधाभास उजागर

अदालत ने स्पष्ट किया कि रिटर्निंग ऑफिसर निर्वाचन आयोग के अधीन कार्य करता है। बिना निर्वाचन आयोग की अनुमति कोई भी ओआईसी उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।

इसके बावजूद—

  • राज्य शासन ने राजपत्र अधिसूचना से पूर्व पदभार ग्रहण को अनुचित बताया।

  • वहीं कलेक्टर-सह-रिटर्निंग ऑफिसर ने नगरपालिका अधिनियम की धारा 55 के तहत प्रथम बैठक के तुरंत बाद पदभार ग्रहण की अनुमति दे दी।

न्यायालय ने इस विरोधाभासी रुख को गंभीर प्रशासनिक विसंगति बताया।


मुख्य सचिव को सीधी जांच का आदेश

अदालत ने मध्यप्रदेश शासन के मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि—

  • श्योपुर कलेक्टर (रिटर्निंग ऑफिसर) के आचरण की स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच करें।

  • स्पष्ट करें कि क्या निर्वाचन आयोग की अनुमति के बिना ओआईसी प्रतिनिधित्व कर सकता है?

  • चंबल आयुक्त की भूमिका और आचरण की समीक्षा करें।

  • 15 दिन के भीतर विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करें।

मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है। अंतिम निर्णय तक अंतरिम आदेश प्रभावी रहेगा।


“न्यायालय को गुमराह करने की कोशिश सहन नहीं”

खंडपीठ ने सख्त शब्दों में कहा कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने या तथ्यों को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करने का कोई भी प्रयास स्वीकार्य नहीं होगा।

राज्य शासन द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत दायर आवेदन में ओआईसी के हस्ताक्षर नहीं पाए गए। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि आवेदन विधिवत स्वीकृति से दायर हुआ या नहीं। अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया न्यायालय को भ्रमित करने का प्रयास माना।


लंबित रखने की कोशिश पर भी टिप्पणी

अदालत ने उल्लेख किया कि राज्य सरकार पूर्व में चुनाव अधिकरण के आदेश का समर्थन कर चुकी थी और अंतरिम आदेश के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में एसएलपी भी दायर की थी, जहां उसे सफलता नहीं मिली।

अब उसी आदेश से दूरी बनाना अदालत को संदिग्ध प्रतीत हुआ। न्यायालय ने संकेत दिया कि पूरा घटनाक्रम मामले को अनावश्यक रूप से लंबित रखने का प्रयास दर्शाता है।


जवाबदेही तय होना तय

इस आदेश के बाद साफ है कि उच्च न्यायालय प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के मूड में है। यदि जांच में अनियमितता सिद्ध होती है तो संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।

श्योपुर की सियासत और प्रशासन—दोनों के लिए यह प्रकरण निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।

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