पत्रकारिता का गिरता स्तर या अधिकारियों की बल्ले-बल्ले? मीडिया संवेदीकरण में ‘पत्रकारों के ठेकेदार’ भी सक्रिय!

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श्योपुर दिनांक: 11 फरवरी 2026 

मीडिया संवेदीकरण कार्यक्रम में उठे तीखे सवाल, जवाबों से बचते दिखे जिम्मेदार

मीडिया संवेदीकरण में ‘पत्रकारों के ठेकेदार’ भी सक्रिय!

दशक पहले पत्रकारिता छोड़ चुके चेहरे भी मंच पर

मीडिया संवेदीकरण में PRO ऑफिस पर मिलीभगत के आरोप

 

श्योपुर। राधिका पैलेस में महिला एवं बाल विकास विभाग के बैनर तले आयोजित “मीडिया संवेदीकरण कार्यक्रम” सवालों के घेरे में आ गया। कार्यक्रम का उद्देश्य मीडिया और प्रशासन के बीच संवाद बताया गया, लेकिन मंच से उठे सवालों पर स्पष्ट जवाब न मिलना और वरिष्ठ पत्रकारों की उपेक्षा ने पूरे आयोजन की मंशा पर ही प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए।

भर्ती में पारदर्शिता पर सवाल

महिला एवं बाल विकास विभाग पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं की भर्ती में पारदर्शिता न होने के आरोप कई बार  लगे है जो अख़बार और शोसल मुडिया पर काफी वायरल होकर चर्चा का बिषय बने है ।  हर भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं। आरोप यह भी लगाए गए कि कई नियुक्तियां पैसों के दम पर हुईं, जबकि पात्र उम्मीदवार दरकिनार कर दिए गए।

कुपोषण के आंकड़ों पर उठे सवाल

पोलियो मुक्त भारत और पोषण अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद आदिवासी और गरीब बस्तियों में कुपोषित बच्चों की स्थिति जस की तस रहने का मुद्दा भी कई बार उठाया गया। अकिन्तु अधिकारीयों के कानों में जू तक नहीं रेंगती है यहाँ  जमीनी हकीकत और सरकारी आंकड़ों में भारी अंतर है। कई बार खबरें प्रकाशित होने के बाद भी कागजों में सुधार दिखाकर वास्तविक स्थिति छिपा दी जाती है।

पॉजिटिव न्यूज़’ की नसीहत पर बहस

कार्यक्रम में कुछ पत्रकारों द्वारा नकारात्मक खबरें प्रकाशित करने पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी किए जाने से माहौल गरमा गया। सवाल उठा कि जब शासन-प्रशासन पारदर्शिता के साथ काम नहीं करेगा, तो केवल “पॉजिटिव न्यूज़” की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? पत्रकारों ने दो टूक कहा कि मीडिया का काम हकीकत सामने लाना है, न कि सिर्फ प्रशंसा गान करना।

वरिष्ठ पत्रकार की अनदेखी से नाराजगी

कार्यक्रम के दौरान पीआरओ कार्यालय के कैमरामैन द्वारा शहर के एक वरिष्ठ पत्रकार की फोटो न लिए जाने को लेकर भी असंतोष सामने आया। उपस्थित पत्रकारों ने इसे संवेदनशीलता की कमी बताया। उनका कहना था कि यदि अपने ही वरिष्ठ पत्रकारों के साथ ऐसा व्यवहार होगा, तो संवेदनशील संवाद की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

सवालों पर गोलमोल जवाब

हमारे साथी पत्रकार ने शहर के विकास से जुड़े मुद्दों पर जब कलेक्टर अर्पित वर्मा से स्पष्ट “हाँ” या “ना” में जवाब मांगा गया, तो उन्होंने मुस्कराते हुए “ध्यान देंगे” कहकर बात टाल दी। पत्रकारों का कहना था कि संवेदीकरण का अर्थ जवाबदेही से बचना नहीं, बल्कि स्पष्टता और प्रतिबद्धता दिखाना होना चाहिए।

मीडिया संवेदीकरण में PRO ऑफिस पर मिलीभगत के आरोप

 मीडिया संवेदीकरण कार्यक्रम में ऐसे लोग भी “पत्रकार” बनकर नजर आए, जिन्होंने वर्षों पहले पत्रकारिता छोड़ दी थी। आरोप है कि PRO ऑफिस की मिलीभगत से अधिकारियों को गुमराह किया गया। सक्रिय और जमीनी पत्रकारों को दरकिनार कर सेटिंगधारी चेहरों को आगे किया गया, जिससे आयोजन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हुए। वरिष्ठ अधिकारियों से मामले की जांच कर दूध का दूध और पानी का पानी करने की मांग उठी।

कलेक्ट्रेट में टैक्सी वाहनों पर भी प्रश्न

कार्यक्रम में  एक और गंभीर मुद्दा उठा—कलेक्ट्रेट परिसर में किराये पर लगी सैकड़ों गाड़ियों का टैक्सी के रूप में उपयोग होता है । आरोप लगाया गया कि कई वाहनों पर पीली नंबर प्लेट नहीं है, जबकि वे किराये पर संचालित हो रहे हैं। सवाल यह भी उठा कि क्या कानून केवल आम जनता के लिए है? यदि टैक्सी का किराया दिया जा रहा है, तो परिवहन नियमों का पालन क्यों नहीं हो रहा? क्या यह सब अधिकारीयों की मिलीभगत से खुद के परिचित लोगों को निजी फायदा पहुँचाने की नियत से हो रहा है 

जागरूक हुई जनता

पत्रकारों का साफ कहना है कि अब 1947 वाली भोली भाली  जनता नहीं है। आज 2026 का नागरिक खबर की तह तक जाता है। पहले जनता बोलती थी और पत्रकार सच्चाई दिखाता था, आज पत्रकार जो लिखता है उसकी सच्चाई जनता खुद खोज निकालती है। ऐसे में भरोसा बनाए रखने की जिम्मेदारी मीडिया और प्रशासन दोनों की है।


Crime National News का मानना है कि संवेदीकरण कार्यक्रम तभी सार्थक होंगे जब संवाद खुला हो, जवाब स्पष्ट हों और पारदर्शिता जमीन पर दिखे। वरना ऐसे आयोजन सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएंगे और सवालों की धार और तेज होगी।

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