श्योपुर/बड़ौदा दिनांक 6/9/2025
बड़ौदा स्वास्थ्य केंद्र में लापरवाही और अभद्रता का हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। इंद्रपुरा निवासी युवती कृष्णा बुखार और स्वास्थ्य समस्याओं के चलते बड़ोदा स्वास्थ्य केंद्र पहुंची थीं। डॉक्टर ने परामर्श के बाद दवाई की पर्ची दी, लेकिन जब वह दवा लेने काउंटर पर पहुँचीं तो स्टाफ ने न केवल उनकी पर्ची को नजरअंदाज किया बल्कि दवा देने से भी साफ इनकार कर दिया।
डॉक्टर ने जांच के बाद दवा की पर्ची थमा दी, लेकिन जब वह दवा लेने स्टोर पर गई तो वहां बैठे स्टोर इंचार्ज स्टाफ ने पर्ची फाड़ दी और दवा देने से साफ इनकार कर दिया।

युवती का आरोप है कि उस समय लाइन में सिर्फ पुरुष मरीज थे, महिला मरीज नहीं थी। नियम अनुसार महिला का नंबर होना चाहिए था, मगर दवा देने के बजाय स्टोर पर मौजूद स्टाफ ने न केवल अभद्र भाषा का प्रयोग किया बल्कि युवती को डांट-डपट कर भगा दिया।
पंखे भी बंद, मरीज गर्मी से बेहाल
घटना के दौरान फार्मेसी विभाग में लगे पंखे भी बंद थे, जिससे मरीज पसीने से तर-बतर परेशान रहे। मामला बढ़ने के बाद ही पंखे चालू किए गए।
“आदिवासी महिलाओं से कैसा बर्ताव होता होगा?”
घबराई युवती दवा लिए बिना सीधे गांव लौट गई और ग्रामीणों को आपबीती सुनाई। उसने मीडिया से कहा –
“जब पढ़ी-लिखी और समझदार महिला मरीजों के साथ फार्मेसी स्टोर पर ऐसा बर्ताव हो सकता है तो दूर-दराज से आने वाली आदिवासी महिलाओं के साथ कैसा व्यवहार किया जाता होगा, यह सोचकर ही डर लगता है।”
ग्रामीणों की मांग – कार्रवाई हो
ग्रामीणों ने इस घटना को बेहद शर्मनाक करार देते हुए जिम्मेदार कर्मियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है।
कलेक्टर के नवाचार पर सवाल
गौरतलब है कि कलेक्टर अर्पित वर्मा हाल ही में महिलाओं के लिए स्वास्थ्य परीक्षण और इलाज की सुविधा सुनिश्चित करने हेतु नवाचार शुरू कर चुके हैं। लेकिन उनके ही अधीनस्थ स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी आदेशों की धज्जियां उड़ाकर महिलाओं को इलाज और दवा से वंचित कर रहे हैं।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या यही कलेक्टर के नवाचार का असली रूप है? अधीनस्थों की कार्यप्रणाली महिलाओं के प्रति सम्मान दर्शाती है या उपेक्षा – यह मामला स्पष्ट करता है।
कृष्णा धाकड़ (युवती मरीज) ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा –
“मैं दर्द और परेशानी में थी, लेकिन स्टाफ ने मेरी पर्ची को गंभीरता से नहीं लिया। उल्टा, उन्होंने मुझसे बदतमीजी की और मेरी दवाई का पर्चा फाड़ दिया और जबरदस्ती हाथ में पकड़ा दिया। यह बहुत अपमानजनक था। क्या गरीब मरीजों को इलाज का हक भी नहीं है?”
उनकी यह बात सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति और स्टाफ के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े करती है।